PETA इंडिया जल्लीकट्टू, बैलों के दौड़ जैसे अन्य आयोजनों के खिलाफ क्यूँ है जिनमे पशु इस्तेमाल होते हैं ?

बैल शोर-शराबे व इस तरह के भीड़भाड़ वाले आयोजनों से घबराहट महसूस करते हैं यह घबराहट एक प्रकर्तिक स्वभाव है लेकिन जल्लीकट्टू में बैलों की इस घबराहट का जानबूझकर फाइदा उठाया जाता है व उन्हें ऐसी खतरनाक स्थिति में डालकर उनका शोषण किया जाता है जिससे वह आक्रोशित भीड़ से डरकर भागने का प्रायस करते हैं।

“Animals in Translation” में पशु व्यवहार से संबन्धित अनसुलझे तथ्यों को उजागर करते हुए प्रसिद्ध पशु कल्याण विशेषज्ञ और कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी में पशु विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. टेंपल ग्रैंडिन एवं कैथरीन जॉनसन लिखते हैं, “किसी जानवर को डर महसूस करवाना भावनात्मक रूप से उसके साथ सबसे बुरा व्यवहार करना है। जानवरों के लिए डर इतना बुरा है कि मुझे लगता है कि यह दर्द से भी बदतर है। जब मैं ऐसा कहता हूं तो लोग बड़ी आश्चर्य भरी नजर से मुझे देखते हैं। लेकिन अगर लोगों को तेज़ दर्द और डर के बीच किसी एक को चुनने को कहोगे तो लोग शायद डर को चुनेंगे”

जल्लीकट्टू में इस्तेमाल होने वाले बैल डर एवं पीड़ा दोनों सहते हैं। शोर मचाती एवं चिल्लाती भीड़ से बचकर भागने के प्रयास में यह डरे सहमे बैल अक्सर फिसल जाते हैं, बैरिकेड से टकरा जाते हैं यहाँ तक कि किनारो पर लगी रेलिंग को ऊंची छलांग मारकर पार करने की कोशिश में अक्सर टकरा कर घायल हो जाते हैं व मर तक जाते हैं।

जैसा कि PETA इंडिया के दस्तावेजों में देखा जा सकता है जल्लीकट्टू के प्रतिभागी बैलों की पुंछ को मरोड़ते हैं व मुंह से काटते हैं, उन्हें थप्पड़, घूंसे मारते हैं, नुकीली छड़ों व हथियारों से यातनाएं देते हैं बैलों को लगातार डराने के लिए उनको नाक में बंधी रस्सी से घसीटते है व उनके उपर कूद जाते हैं।

PETA इंडिया ने यह भी रिकॉर्ड किया है कि दौड़ के दौरान बैल सिर्फ इसलिए भागते हैं क्यूंकि लोग उनको पीड़ा पहुँचाते हैं। इस खेल के दौरान उनको बचकर भागने के लिए हर तरह से प्रताड़ित किया जाता है, नंगे हाथो से थप्पड़ बरसाए जाते हैं, नुकीली काँटेदार छड़े चुभोई जाती हैं व उनकी पुंछ को हर जोड़ से मरोड़कर तोड़ दिया जाता है। बैलों को भी उतनी ही पीड़ा होती है जितनी हमें हमारी उंगली टूट जाने से होती है।

बैलों की लड़ाई में, एक राउंड तब समाप्त हो जाता है जब कोई एक बैल घायल होकर गिर जाता है, भाग जाता है या फिर मर जाता है।
जब से “पशु क्रूरता निवारण (तमिलनाडू संशोधन) अधिनियम 2017” पारित हुआ है तब से अब तक कम से कम 43 मनुष्य (जिसमे 11 दर्शक हैं), 14 बैल तथा 1 गाय की मौत हो चुकी है। वास्तविक संख्या इस से कहीं ज्यादा है क्यूंकि बहुत से मामले सामने नहीं आते और बैलों की चोटों का तो कोई लेखा जोखा ही नहीं होता।

PETA इंडिया केवल जल्लीकट्टू को ही क्यूँ टारगेट करता है?

PETA इंडिया इस सिद्धांत के तहत काम करता है कि जानवर हमारे प्रयोग करने, भोजन बनने, वस्त्र बनने, मनोरंजन हेतु इस्तेमाल होने या फिर किसी भी अन्य तरह से दुर्व्यवहार सहने के लिए नही हैं। हम पशुओं से जुड़े अनेकों अन्य मुद्दों पर कार्य करते हैं जैसे वीगन एडवोकेसी से लेकर साथी पशुओं की नसबंधी तक। हमारे अभियानों से संबन्धित अधिक जानकारी हेतु कृपया हमारी वेबसाईट PETAIndia.com पर जाएँ।

अगर आप ध्यान दें तो पायेंगे की हम जानवरों के साथ होने वाली सभी तरह की क्रूरता के खिलाफ हैं जिसमें बैल दौड़ एवं जल्लीकट्टू भी शामिल हैं, और पशु संरक्षण कानूनों का समर्थन करते हैं। भारत के राजपत्र के माध्यम से 7 जुलाई 2011 को केंद्र सरकार द्वारा दी गयी अधिसूचना में कहा गया है की जानवरों को प्रदर्शनों में इस्तेमाल करना गैरकानूनी है व यह उनके कल्याण की सोच से अलग है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 7 मई 2014 के अपने फैसले में, प्रदर्शनों में बैलों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित किया। अदालत ने यह भी फैसला दिया कि इन घटनाओं में क्रूरता निहित है, क्योंकि बैल का शरीर इस तरह की दौड़ों के लिए उपयुक्त नहीं है। यह देखा गया है कि बैलों को मजबूर कर उन्हें अनावश्यक दर्द और पीड़ा देकर इस तरह के ख्लेओन में हिस्सा लेने के लिए मजबूर किया जाता है, इसलिए उन्होंने फैसला सुनाया कि इस तरह की दौड़ को कानून की अनुमति नहीं है व यह पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (पीसीए), 1960 का उल्लंघन किया है। जल्लीकट्टू क्रूर खेल है व इसमे बैलों को जबरन अनावश्यक दर्द एवं पीड़ा दी जाती है जो की पिछले 60 वर्षों से चल रहा है।

7 मई 2014 द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पैरा 77 में यह कहा गया है:
AWBI (एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया) का रुख एकदम सही है कि जल्लीकट्टू, बैलगाड़ी दौड़ या दौड़ें तथा इस तरह के अन्य कार्यक्रम पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 3, 11 (1) (a) और 11 (1) (m) (ii) का उल्लंघन करते हैं इसलिए केंद्र सरकार द्वारा दिनांक 11/7/2011 को जारी की गयी अधिसूचना को बरकरार रखा जाता है। नतीजतन, जल्लीकट्टू या तमिलनाडु राज्य या फिर देश में कहीं भी होने वाली बैलगाड़ी दौड़ के लिए बैलों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है।

पीसीए अधिनियम, 1960 की धारा 3 और 11 (1) (ए), यदि कोई व्यक्ति किसी पशु के साथ मार पीट करता है, ओवरराईड, ओवरड्राइव, ओवरलोड करता है, यातना देता है, या किसी भी अन्य तरीके से अनावश्यक तरीके से पीड़ा पाहुचता है या यातना देता है, या उस पशु का मालिक ऐसा करने की अनुमति देता है तो यह सब गैर कानूनी है।” पीसीए अधिनियम, 1960 की धारा 11 (1) (एम) (ii) के तहत अगर कोई व्यक्ति “किसी जानवर को कैद करता है या किसी अन्य उद्देश्य से बंदी बनाता है (जिसमे बाघों के अभयारण्य में उनके चारे के रूप में बंदी बनाता है) या उसे किसी वस्तु की तरह किसी अन्य जानवर के खाने या शिकार हेतु इस्तेमाल करता है तो यह कानूनन अवैध है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि “किसी भी जानवर या इंसान की आपस में लड़ाई हो सकती है” इस लिए आदेश में कहा गया है, “तमिलनाडु रेग्युलेशन ऑफ जल्लीकट्टू अधिनियम (TNRJ) की धारा 5 तहत बैल एवं बैल को प्रशिक्षित करने वाले प्रशिक्षक के बीच लड़ाई हो सकती है इसलिए इसका तात्पर्य है होगा कि प्रशिक्षक उस बैल को अपने वश में करने के लिए यह लड़ाई कर सकता है। लेकिन इस तरह का व्यवहार एवं लड़ाई को पीसीए अधिनियम की धारा 11 (1) (एम) (ii) के तहत निषिद्ध माना गया है, इस धारा को सेक्शन 3 के साथ पड़ा जाना चाहिए।

उस तर्क के बारे में आप क्या कहेंगे जो यह कहता है कि जल्लीकट्टू की अनुमति इसलिए दी जानी चाहिए क्योंकि यह भारत की संस्कृति तथा परंपरा का हिस्सा है या इसका एक धार्मिक महत्व है ?

अनगिनत तमिलियन लोग PETA इंडिया का समर्थक करते हुए जल्लीकट्टू की खिलाफत करते हैं इसलिए यह तर्क उनको भी आहात करता है कि लोग धर्म की आड़ लेकर जल्लीकट्टू को तामिल संस्कृति बोलकर पशुओं पर अत्याचार कर रहे हैं। भारत की संस्कृति दया करना है क्रूरता नहीं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 A (G) में प्रत्येक भारतीय नागरिक को आदेश दिया गया है कि वह “जंगलों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार और जीवों के प्रति दयभाव रखें । 7 मई 2014 सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अनुच्छेद 42 में कहा गया है :
TNRJ अधिनियम की धारणा प्राचीन संस्कृति और परंपरा को संदर्भित करती है इस अधिनियम में सका कोई धार्मिक महत्व नहीं बताया है। और जिस तरह से आजकल की जल्लीकट्टू दौड़ें आयोजित होती है हमारी प्राचीन संस्कृति और परंपरा उस तरह से जल्लीकट्टू या बैलगाड़ी दौड़ों के संचालन का समर्थन नहीं करती है। बैल की हिफाजत और उनका कल्याण तामिल संस्कृति और परंपरा है, तामिल संकस्कृति में बैलों को पीड़ा देना या उनपर अत्याचार करने को गलत कहा गया है तथा तामिल परंपरा और संस्कृति में बैल की पूजा की जाती है और बैल को हमेशा भगवान शिव के वाहन के रूप में माना जाता है । तमिल परंपरा में, येरु थज़ुवु के तहत मानव बहादुरी दिखाने का मतलब गले लगाना है उस पर क्रूरता करना नहीं।

निष्कर्ष यह है, “जल्लीकट्टू या बैलगाड़ी दौड़, जैसा कि अब प्रचलित है, तमिलनाडु की परंपरा या संस्कृति इसका ऐसा रूप कभी नहीं रहा है ” इसे अनुच्छेद 43 में इस तरह बताया गया है:
पीसीए अधिनियम, एक कल्याणकारी कानून है जो जो हमारे विचार में परंपरा और संस्कृति को ओवरशेड या ओवरराइड करता है। जल्लीकट्टू या बैलगाड़ी दौड़ जिन्हें अब जिस तरह से आयोजित किया जाने लगा है उन्हें तामिल परंपरा या संस्कृति समर्थन नहीं करती। यह मानते हुए कि यह खेल काफी समय से प्रचलन में है हमारे विचार में PCA अधिनियम में पशुओं के कल्याण लिए कही गयी बातों को स्वीकार करना चाहिए और जानवरों को पालने एवं उनकी देखभाल कर्ताओं का यह कर्तव्य है कि वह जानवरों पर अनावश्यक दर्द या पीड़ा को रोकने हेतु अपने दायित्वों का वहन करें।

किसी भी मामले में, केवल इतिहास के आधार पर किसी पर दुवयवहार या अत्याचार करते जाना सही नहीं है और हमारे पास स्वतंत्र विचार रखने, सहानुभूति प्रदर्शित करने और स्वयं निर्णय लेने का कारण व उसे लागू करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, मांस खाने वाली संस्कृति के साथ पले-बढ़े कई लोगों ने आगे चलकर मांस, अंडे और डेयरी खाद्य पदार्थों के उत्पादन में जानवर कैसे पीड़ित होते हैं इस पार जानकारी प्राप्त करने के बाद वीगन जीवनशैली को अपना लिया है। हम यह स्वयं निर्णय ले सकते हैं कि हमे किस प्रकार अपना जीवन जीना है और उन आदतों को अपनाना है जिनसे दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचता। हमें इतिहास या समाज की परम्पराओं के द्वारा अपनी जीवन शैली निर्धारित करने की आवश्यकता नहीं है, खासकर अगर पारंपरिक मानदंडों के अनुसार हमे क्रूरता सिखायी जा रही है या फिर और जीवित, सांस लेने, व सोचने समझने वाले प्राणियों का दुरुपयोग करने की सीख दी जा रही है।
इसके अलावा, हिंदू आमतौर पर नंदी बैल की मूर्ति के माथे को छूकर भगवान शिव के सम्मान में मंदिरों में बैल की पूजा करते हैं। यदि कुछ उपद्रवी भगवान शिव के मंदिर में प्रवेश करें और नंदी की मूर्ति को क्षति पाहुचाए तो क्या लोगों को इसका विरोध नहीं करना चाहिए। फिर जिंदा बैल जो कि भगवान शिव की सवारी के रूप में पूजा जाता है, उसके साथ ऐसा अत्याचार क्यूँ?

कुछ लोग कहते हैं कि अगर बैल का उपयोग जल्लीकट्टू के लिए नहीं किया जाता है, तो उन्हें वध करने के लिए बेच दिया जाएगा।

12 जनवरी 2016 को इंडियन एक्सप्रेस में “जल्लीकट्टू में परंपरा एवं क्रूरता से संबन्धित सवाल” नामक एक छपे एक लेख में यह कहा गया है कि “जल्लीकट्टू या बैल दोड़ों के लिए टिकट नहीं बेचे जाते”, इस लेख में कहा गया है:

जल्लीकट्टू के दौरान कोई बहुत बड़े इनाम नहीं दिये जाते और इसमे मिलने वाले पुरस्कार ज्यादातर धोती, तौलिया, सुपारी, केले या फिर कुछ नगदी जैसे एक चंडीन की प्लेट पर 101 रुपये से संबन्धित होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में जल्लीकट्टू के दौरान विजेताओं को मिक्सर-ग्राइंडर, रेफ्रिजरेटर और फर्नीचर जैसे इनाम भी दिये गए हैं।

लेकिन वास्तव में यह सही नहीं है। “द हिंदू” में दिनांक 14 जनवरी 2017 “जल्लीकट्टू में 43 जाने गयी: AWBI” नामक शीर्षक के तहत छपे एक लेख में कहा गया है एक जल्लीकट्टू कार्यक्रम के लिए टिकिटों की बिक्री भी की गयी और इस प्रतियोगिता के विजेताओं के लिए पुरस्कारों में कारों और मोटरसाइकिलों को भी शामिल किया गया है। लेकिन अगर परंपरा का ध्यान रखते हुए इस खेल में जीतने वाले विजेताओं को कोई नगद पुरुस्कार नहीं दिये जाते तो फिर जल्लीकट्टू बंद भी हो जाने पर किसानों के जीवन में कोई आर्थिक असर नहीं पड़ता तो फिर उन्हें अपने बैल को वध करने के लिए बेचने की जरूरत ही नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने मदुरई जिले के पलामेडु के पास मणिकमपट्टी के एक निवासी के हवाले से कहा, “मेरे दो बच्चे हैं, लेकिन फिर भी मैं अपने बैल करुप्पासामी को अधिक प्यार करता हूं। आमतौर पर जल्लीकट्टू वाले बैल को भगवान शिव के बैल का दर्जा दिया जाता है और हम उन्हें पवित्र मानते हैं” अगर बैल को पवित्र माना जाता है, तो निश्चित रूप से उन्हें कत्ल करने के लिए नहीं बेचा जाएगा।

बैल के जीवन में मौत ही एकमात्र पीड़ा नहीं है। कई तरह की क्रूरताएं भी हैं और वह सब भी गलत हैं। हालांकि, जब वे प्रशिक्षण प्राप्त करने के दौरान या फिर जल्लीकट्टू के दौरान घायल हो जाते हैं, व जब उनको काम लायक नहीं समझा जाता तो उनका जीवन भी किसी न किसी कत्लखाने में जाकर समाप्त हो जाता है। जल्लीकट्टू आयोजनों के दौरान भी बहुत से बैलों की मौत हो चुकी है।

कुछ लोग कहते हैं कि जल्लीकट्टू पर रोक लगा देने से बैलों के देसी नस्ल समाप्त हो जाएगी।

संरक्षण का मतलब क्रूरता करना नहीं है। यदि कोई व्यक्ति यह सलाह दे कि बाधों पर क्रूरता करने या फिर उन्हें मार डालने के लिए उनको पाला जाना चाहिए तो शायद ऐसी सलाह देने वाले को पागल कहा जाएगा।

भारत में मवेशी जानवरों की नस्ल कई वर्षों से बदलती रही है और इसके बहुत से कारण रहे हैं। जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगाना अव्यावहारिक है यह हवाला देकर पशुओं की नस्ल में बदलाव किया गया है। मनुष्य अपनी जरूरतों के अनुसार मवेशी जानवरों की नस्ल में बड़े पैमाने पर परिवर्तन करता है जैसे कि दूध उत्पादन में वृद्धि करना। और नस्ल में परिवर्तन का मतलब किसी प्रजाति के विलुप्त होने से नहीं है। पालतू मवेशियों को लुप्त होने वाली प्रजातियों की सूची में होने का खतरा नहीं है। फिर भी, जहां जरूरी हो पशुपालन विभाग विभिन्न वैज्ञानिक तकनीकों के द्वारा इन नस्लों को बनाए रखते हैं।
यह उन लोगों का तर्क है जो यह कहते हैं कि जल्लीकट्टू के लिए लोग “स्टड बैल” पालते हैं। जो बैल जल्लीकट्टू प्रतियोगिता जीत जाते हैं उनसे गायों को गर्भवती करवाने की मांग बढ़ जाती है। हालाँकि, जल्लीकट्टू का अंत इस उद्देश्य के लिए नहीं है कि बैल को इस तरह इस्तेमाल करने से रोका जा सके। ऐसा कहा जाता है कि कि छोटे किसान स्टड बैल रखने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं, इसलिए प्रत्येक गांव में एक आम बैल मंदिर बैल होता है, जिसका उपयोग गांव की गायों को गर्भवती करने के लिए किया जाता है। हालांकि, यह प्रथा आगे भी जारी रह सकती है। इसके अलावा, एक पशु चिकित्सक ग्रामीणों को सूचित करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि जल्लीकट्टू आयोजन में अच्छे परिणाम लाने वाली सोच के अलावा भी वह बैल अपने सामान्य जीवन में स्वस्थ्य व तंदुरुस्त है।

कुछ बैल का उपयोग केवल जल्लीकट्टू खेल में किया जाता है जबकि बाकी बहुत से अन्य बैलों से खेती या परिवहन संबंधी कार्य लिए जाते हैं इसलिए जल्लीकट्टू बंद हो जाने से उन बैलों के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आयेगा व उनसे लिए जाने वाले कार्य उसी तरह से चलते रहेंगे।

मैंने अफवाहें सुनी हैं कि PETA इंडिया केवल विदेशी नस्लों के मवेशियों को बढ़ावा देना चाहता है। क्या यह सच है?

अगर यह बात सच होती तो शायद बहुत गंभीर और जटिल समस्या होती।

PETA इंडिया एक पशु अधिकार संगठन है, और हम इस सिद्धांत में विश्वास करते हैं कि “पशु हमारा भोजन बनने के लिए नहीं है”। हम वीगन जीवन शैली का समर्थन करते हैं, जिसका अर्थ है कि हमें मांस या डेयरी उत्पादन के लिए मवेशियों की विदेशी नस्लों को बढ़ावा देने में कोई दिलचस्पी नहीं है और वास्तव में, हम मांस और डेयरी उद्योगों पशुओं पर होने वाली क्रूरता के चलते उनके खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाते हैं।

PETA इंडिया कत्लखानों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाता ?

काश हम ऐसा कर सकते। PETA इंडिया एक गैर सरकारी संगठन है व हमारे पास यह अधिकार नहीं है कि हम किसी पर रोक लगा सकें और अदालतें केवल मौजूदा कानूनों के अनुसार अपनी कार्यवाही करी हैं।

PETA इंडिया ने राज्य सरकारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक केस लड़ा, जिसमें आरोप लगाया गया था कि बूचड़खाने में और जानवरों के परिवहन के दौरान जानवरों के साथ बेहद क्रूरता होती है। अदालत ने सभी राज्यों को बिना लाइसेंस वाले बूचड़खानों पर कार्रवाही करने का आदेश दिया है, साथ ही इस कानून को सख्ती से लागू करने के लिए, कानून प्रवर्तन समितियों के गठन का आदेश भी दिया। भले ही कानून लागू कर दिये गए हो लेकिन फिर फिर भी जानवर मर रहे हैं। इसीलिए हम लोगों से अनुरोध करते हैं कि चमड़े को न पहने और वीगन बने क्योंकि यही एक तरीका है जब हम मांग में कमी लाकर पशुओं पर होने वाली क्रूरता में कमी ला सकते हैं। हम लोगों को मुफ्त में वीगन स्टार्टर कीट देते हैं ताकि लोग वीगन जीवनशैली अपना सके। मुफ्त वीगन स्टार्टर किट को PETAIndia.com से मंगवाया जा सकता है।

PETA इंडिया जानवरों की बलि प्रथा जैसे कि ईद अल-अधा (बकरीद) के दौरान होनेवाली कुर्बानी पर रोक लगवाने की मांग क्यू नहीं करता?

हम बिलकुल करते हैं। सभी धर्म, दया और करुणा की बात करते हैं और कोई भी धर्म अपने अनुयाइयों को मांस खाने का समर्थन नहीं करता। इंडियन प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल्स (स्लॉटर हाउस) नियम, 2001 के अनुसार, “जानवरों का कत्ल केवल मान्यता प्राप्त या लाइसेंस प्राप्त कत्लखानों में ही किया जा सकता है”। इसका मतलब यह है कि, जो भी व्यक्ति घर पर या किसी भी अन्य स्थान पर जानवरों का क़त्ल करता है वह गैर कानूनी है व उसकी शिकायत पुलिस में दर्ज की जा सकती है। इसमे भी कोई दो राय नहीं कि लाइसेंस प्राप्त कत्लखाने क्रूर नही होते। PETA इंडिया ने एक जांच के द्वारा बकरीद के कुछ दिन पहले मुंबई के देवनार बूचड़खाने में जानवरों के प्रति होनेवाली क्रूरता को उजागर किया। इस तरह की क्रूरता पर रोक लगवाने में आप मदद कर सकते हैं।

PETA इंडिया, स्पेन में होनेवाले बैल की लड़ाई (बुल फाइटिंग) के बारे में कुछ कार्रवाई क्यों नहीं करता है?

भारत में जल्लीकाटू की तरह बुल फाइटिंग भी प्रतिबंधित है। PETA इंडिया का कार्य क्षेत्र भारत व दक्षिण एशिया है, लेकिन हमारे अन्य सहयोगी भी हैं जो UK व US में पशुओं से जुड़े मुद्दों पर कार्य कर रहे हैं जिसमे बुल फाइटिंग भी शामिल है और हम उनके प्रयासों का समर्थन करते हैं। दुनिया भर में केवल कुछ ही देश हैं जहाँ आज भी यह प्रथा चली आ रही है। कई देशों में बैल की लड़ाई (बुल फाइटिंग) खेल पर पर रोक लगाई हजा चुकी है।

PETA US के बारे में आपकी क्या राय है?

PETA इंडिया और PETA US पूरी तरह से अलग-अलग संस्थाएँ हैं। PETA इंडिया एक भारतीय संस्था है व इसके समस्त अभियान भारत में पशुओं के मुद्दों से जुड़े हैं। PETA US के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया PETA.org पर जाएँ।